भारत में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को कैसे हटाया जाता है?

जबसे दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर से करोड़ों रुपये नकद बरामद हुए हैं, भारतीय न्यायपालिका जनता के विश्वास के कटघरे में खड़ी हो गई है।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने भी कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार सुप्रीम कोर्ट के प्रति जनता का भरोसा खत्म कर सकता है।

अब जब जस्टिस वर्मा के घर से करोड़ों रुपये बरामद हुए, सुप्रीम कोर्ट कोलीजियम ने उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया। उनसे इस्तीफा मांगा गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

🔍 जानिए – जज को हटाने की प्रक्रिया के मुख्य बिंदु:
  • महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
  • स्पीकर/चेयरमैन प्रस्ताव स्वीकार करते हैं तो तीन-सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है।
  • रिपोर्ट आने के बाद दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास करना होता है।
  • राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ ही जज को पद से हटा दिया जाता है।
  • अब तक किसी भी जज को संसद ने महाभियोग से नहीं हटाया है।

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज संजय किशन कौल ने राष्ट्रपति और वर्तमान सरकार से जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) चलाने की अपील भी की है।

क्या फर्क है इस्तीफा और महाभियोग में?

अगर कोई जज इस्तीफा दे देता है, तो उसे रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सारी सुविधाएं मिलती रहती हैं। लेकिन अगर महाभियोग के ज़रिए हटाया जाता है, तो वह सारी सुविधाएं बंद हो जाती हैं।


अब जानिए – हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

भारत में पहले National Judicial Appointment Commission (NJAC) बनाया गया था, ताकि जजों की नियुक्ति पारदर्शी हो। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया।

वर्तमान में भारत में जजों की नियुक्ति “कोलीजियम सिस्टम” के तहत होती है।

📑 Table of Contents
  1. जज को हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
  2. महाभियोग और इस्तीफे में क्या अंतर है?
  3. भारतीय संविधान में क्या प्रक्रिया है?
  4. महाभियोग की पूरी कानूनी प्रक्रिया
  5. अब तक किन जजों पर महाभियोग लाया गया?

भारतीय संविधान में जजों को हटाने का प्रावधान:

अनुच्छेद 124(4): सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने का प्रावधान

अनुच्छेद 218: हाई कोर्ट के जज को हटाने का प्रावधान

दोनों के लिए महाभियोग की प्रक्रिया एक जैसी है, बस संविधान के अनुच्छेद अलग-अलग हैं।

एक जज को हटाया जा सकता है अगर वह:

भ्रष्टाचार में लिप्त हो

अयोग्य साबित हो


जज को हटाने की पूरी प्रक्रिया क्या है?

➤ जजेस (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968 के सेक्शन 3 के अनुसार:

लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों

राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।

➤ महाभियोग की शुरुआत:

  1. लोकसभा या राज्यसभा के सदस्य महाभियोग प्रस्ताव लाते हैं।
  2. अगर यह प्रस्ताव लोकसभा में लाया गया है, तो कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
    अगर राज्यसभा में लाया गया है, तो 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
  3. यह प्रस्ताव लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के चेयरमैन (उपराष्ट्रपति) को सौंपा जाता है।
  4. स्पीकर या चेयरमैन इस प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।

📘 अधिक जानकारी के लिए पढ़ें:भारत का संविधान – आधिकारिक पीडीएफ (legislative.gov.in)


अगर प्रस्ताव स्वीकार हो जाए तो क्या होता है?

यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया, तो:

एक तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है।

इस समिति में कौन होता है?

  1. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या कोई वरिष्ठ जज
  2. हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश या कोई वरिष्ठ जज
  3. एक प्रतिष्ठित विधि विशेषज्ञ (Law Eminent Person)

यह समिति जज पर लगे आरोपों की जांच करती है और एक रिपोर्ट बनाकर संसद में वापस भेजती है।

⚖️ संबंधित कानून पढ़ें:Judges (Inquiry) Act, 1968 – Full Text (IndianKanoon.org)


संसद में वोटिंग कैसे होती है?

समिति की रिपोर्ट आने के बाद, महाभियोग प्रस्ताव को दोनों सदनों में पास होना होता है – लोकसभा और राज्यसभा में।

यह पास होता है “विशेष बहुमत (Special Majority)” से:

  1. कुल सदस्यों का 50% से अधिक समर्थन
  2. वोटिंग में उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत

फिर क्या होता है?

दोनों सदनों में पास होने के बाद यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।

जैसे ही राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर करते हैं, उस जज को तत्काल प्रभाव से हटा दिया जाता है।


अब तक भारत में कितने जज महाभियोग से हटाए गए?

भारत में अब तक किसी भी जज को महाभियोग के ज़रिए नहीं हटाया गया है।

आइए जानते हैं कुछ चर्चित केस:

  1. 1993 – जस्टिस वी. रामास्वामी (सुप्रीम कोर्ट):
    समिति ने दोषी माना लेकिन संसद में वोटिंग के दौरान पर्याप्त बहुमत नहीं मिल सका।
  2. 2011 – जस्टिस सौमित्र सेन (कोलकाता हाई कोर्ट):
    राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पास हुआ, लेकिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
  3. 2015 – जस्टिस जमशेद परदीवाला (गुजरात हाई कोर्ट):
    आरक्षण पर विवादास्पद टिप्पणी को लेकर 58 सांसदों ने प्रस्ताव लाया।
  4. 2015 – जस्टिस एस.के. गंगेले:
    यौन उत्पीड़न के आरोप लगे थे। समिति ने दोषी माना लेकिन पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण प्रस्ताव पास नहीं हुआ।
  5. 2017 – जस्टिस नागर्जुन रेड्डी (तेलंगाना–आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट):
    महाभियोग प्रस्ताव लाया गया लेकिन आगे नहीं बढ़ सका।
  6. 2018 – चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा (सुप्रीम कोर्ट):
    विपक्ष ने महाभियोग की बात की, लेकिन उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने प्रस्ताव खारिज कर दिया।
  7. जस्टिस पी.डी. दिनाकरन (सिक्किम हाई कोर्ट):
    समिति बनने से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

निष्कर्ष:

भारतीय संविधान में जजों को हटाने की प्रक्रिया काफी जटिल और कठिन है। इसका मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा को बनाए रखना है।

लेकिन अगर जजों पर गंभीर आरोप साबित हो जाएं और संसद में विशेष बहुमत मिल जाए, तो उन्हें महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है।

Justice यशवंत वर्मा के मामले ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है — क्या भारत अब अपने पहले सफल महाभियोग की ओर बढ़ रहा है?

अरुण त्रिपाठी

अरुण MyNews98.com के संस्थापक हैं। वे अंतरिक्ष, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर सरल भाषा में गहरी जानकारी प्रस्तुत करते हैं।

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