मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर सीमा पर तनाव बढ़ा, और इसी दौरान तुर्किये ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया। तुर्की सरकार ने न सिर्फ पाकिस्तान को 300 से 400 आधुनिक ड्रोन मुहैया कराए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पाकिस्तान के पक्ष में बयान दिए।
🌐 भू-राजनीतिक जानकारी:
तुर्की ने हाल ही में पाकिस्तान के साथ मिलकर एक संयुक्त रक्षा अभ्यास आयोजित किया था, जिसमें ड्रोन और साइबर युद्ध तकनीक पर फोकस किया गया। भारत ने इस पर कड़ा आपत्ति जताई, और इसे दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए ख़तरा बताया।
यह भारत के लिए चौंकाने वाली बात थी, क्योंकि जब 2023 में तुर्की में विनाशकारी भूकंप आया था, तब भारत ने ऑपरेशन दोस्त के तहत मानवीय सहायता भेजी थी। भारत ने सैकड़ों टन राहत सामग्री, मेडिकल टीम्स और विशेष सर्च रेस्क्यू दल भेजे थे।
लेकिन अब वही तुर्की भारत के विरोधी देश का समर्थन कर रहा है, जिससे भारत में गुस्सा और निराशा दोनों फैले हैं।
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भारत में तुर्की सामानों और पर्यटन का बहिष्कार
तुर्किये की इस कार्रवाई के बाद भारत में तुर्की ब्रांड्स और उत्पादों के खिलाफ व्यापक स्तर पर बहिष्कार शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey ट्रेंड कर रहा है।
भारतीय नागरिक तुर्की के सामान जैसे कि मार्बल, सेब, इलेक्ट्रॉनिक्स और सजावटी सामान खरीदने से परहेज़ कर रहे हैं। वहीं भारत सरकार ने एक तुर्की एविएशन कंपनी की सुरक्षा सुविधा भी समाप्त कर दी।
भारत से हर साल लगभग 4 लाख से ज्यादा पर्यटक तुर्की जाते हैं। इससे तुर्की को लगभग ₹4000 करोड़ की आमदनी होती है। लेकिन अब तक 60% से अधिक भारतीयों ने अपनी तुर्की यात्रा रद्द कर दी है। ट्रैवल एजेंसियों के अनुसार यह रद्दीकरण दर पिछले साल के मुकाबले 250% तक बढ़ चुकी है।
📊 भारत और तुर्की के व्यापारिक आंकड़ों की आधिकारिक जानकारी के लिए यह वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट पढ़ें।
भारत-तुर्की व्यापार संबंध: किसे होगा ज्यादा नुकसान?
भारत और तुर्की के बीच कुल व्यापार $10.4 अरब अमेरिकी डॉलर का है, जिसमें भारत का पलड़ा भारी है। भारत तुर्की को $6.65 अरब के उत्पाद भेजता है, जिनमें प्रमुख हैं:
इंजीनियरिंग गुड्स
फार्मास्युटिकल्स
टेक्सटाइल
मिनरल ऑयल
तुर्की से भारत आयात करता है:
सोना
सेब
बोरोन केमिकल्स
मार्बल
हालांकि यह व्यापारिक आंकड़े बड़े लगते हैं, लेकिन भारत के कुल निर्यात और आयात में तुर्की की हिस्सेदारी बहुत कम है — सिर्फ 1.5% निर्यात में और 0.5% आयात में। यानी भारत की निर्भरता तुर्की पर बेहद कम है। इसके उलट, तुर्की की अर्थव्यवस्था पहले से ही धीमी गति से चल रही है और भारत जैसा बड़ा बाजार उसके लिए बेहद जरूरी है।
भू-राजनीतिक समीकरण: भारत का जवाबी रणनीतिक मोर्चा
तुर्की लगातार पाकिस्तान, अज़रबैजान और चीन के साथ मिलकर एक नई धुरी बनाता दिख रहा है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है। लेकिन भारत भी चुप नहीं है। भारत अब ग्रीस और साइप्रस जैसे देशों के साथ सामरिक और व्यापारिक संबंध मज़बूत करने में लगा है, जो तुर्की के पारंपरिक विरोधी माने जाते हैं।
🌍 संयुक्त राष्ट्र में तुर्की द्वारा कश्मीर मुद्दे पर दिए गए बयान और भारत की प्रतिक्रिया जानने के लिए यह रिपोर्ट देखें (Al Jazeera)।
इसके अलावा भारत मध्य एशिया और यूरोप तक अपनी पहुंच को और बढ़ाने के लिए OIC (Organization of Islamic Cooperation) में रणनीतिक रूप से सक्रिय होने की कोशिश कर सकता है, हालांकि वहां तुर्की का प्रभाव बना हुआ है।
व्यापारिक क्षेत्रों में प्रभाव: फार्मा, ऊर्जा और निर्माण
तुर्की भारत से बड़ी मात्रा में दवाइयाँ खरीदता है। अगर वह उन पर टैरिफ लगाता है, तो भारत को कुछ नुकसान हो सकता है। लेकिन भारत के पास फार्मा उत्पादों के लिए अफ्रीकी देशों और यूरोपीय संघ जैसे बड़े और स्थायी बाजार मौजूद हैं।
दूसरी ओर भारत तुर्की से बोरोन केमिकल्स और न्यूक्लियर रिएक्टर पार्ट्स आयात करता है जो ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में अहम हैं। अगर तुर्की इन पर रोक लगाता है, तो भारत को वैकल्पिक सप्लायर की तलाश करनी पड़ेगी।
भारत के कई शहरों जैसे पुणे और उदयपुर में तुर्की से आयात होने वाले मार्बल का व्यापार होता है। वर्तमान स्थिति में कई व्यापारियों ने तुर्की से माल मंगाना बंद कर दिया है।
निष्कर्ष: भारत या तुर्की – किसके लिए भारी पड़ेगा तनाव?
अगर भारत और तुर्की के बीच यह कूटनीतिक और आर्थिक तनाव और गहराता है, तो तुर्की को इसका अधिक नुकसान होगा। भारत एक वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है और उसकी आयात-निर्यात नीति विविध और मजबूत है। वहीं तुर्की लगातार आर्थिक संकटों और कूटनीतिक चुनौतियों से जूझ रहा है।
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भारत को अगर नुकसान होगा भी, तो वह सीमित और वैकल्पिक उपायों से काबू में आ जाएगा। लेकिन तुर्की के लिए भारत का बहिष्कार भारी आर्थिक झटका साबित हो सकता है — खासकर पर्यटन, दवाइयों और इंजीनियरिंग उत्पादों के क्षेत्र में।
यदि यह स्थिति सुलझती नहीं है, तो दोनों देशों के बीच वर्षों पुराने व्यापारिक और सांस्कृतिक रिश्ते कमजोर हो सकते हैं।
हालांकि, डिप्लोमेसी अभी भी दोनों देशों के पास एक रास्ता है — जहां बातचीत और संतुलन से इस तनाव को टाला जा सकता है।
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