अगर ईरान पर युद्ध छिड़ गया, तो कौन-कौन देश देंगे उसका साथ?

ईरान और इज़राइल के बीच लगातार बढ़ रहा तनाव अब एक संभावित वैश्विक युद्ध की आशंका को जन्म दे रहा है। हालात तब और बिगड़ गए जब रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए, जबकि इज़राइल भी क्षेत्र में अपनी सैन्य कार्रवाई बढ़ाता जा रहा है।

अब सवाल यह नहीं है कि युद्ध होगा या नहीं — बल्कि यह है कि अगर युद्ध हुआ, तो कौन ईरान के साथ खड़ा होगा?

जैसे-जैसे मध्य पूर्व में हालात बिगड़ते जा रहे हैं, ईरान खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर तेजी से अकेला महसूस कर रहा है।
पश्चिमी देशों ने पहले ही उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया है, और कई इस्लामिक संगठन और क्षेत्रीय समूह या तो चुप हैं या तटस्थ।

इस लेख में हम जानेंगे कि अगर युद्ध होता है, तो कौन-कौन से देश ईरान का समर्थन कर सकते हैं।


🇷🇺 रूस

रूस और ईरान के बीच वर्षों से मजबूत संबंध हैं।

2022 में जब ईरान ने Shahed ड्रोन रूस को यूक्रेन युद्ध के लिए दिए, तो रूस ने इसके बदले सैन्य और कूटनीतिक सहयोग प्रदान किया।

दोनों देश पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं।

रूस शायद खुले तौर पर युद्ध में शामिल न हो, लेकिन वह हथियार, जानकारी (इंटेलिजेंस) और राजनयिक सुरक्षा देकर सहायता कर सकता है।

संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर के जरिए भी रूस ईरान को अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचा सकता है।


🇨🇳 चीन

चीन, ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है।

क्षेत्रीय स्थिरता और व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए चीन सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचेगा।

अगर युद्ध होता है, तो चीन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान के खिलाफ कड़े कदमों का विरोध कर सकता है।

वह बड़े पैमाने पर तेल खरीद और गैर-सैन्य सहायता से अप्रत्यक्ष रूप से ईरान की मदद कर सकता है।

लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन सीधे युद्ध में हिस्सा नहीं लेगा।


🇸🇾 सीरिया

जब सीरिया में गृह युद्ध शुरू हुआ, तब ईरान ने राष्ट्रपति बशर अल-असद का सैन्य और वित्तीय समर्थन किया।

बदले में, अगर ईरान युद्ध में घिरता है तो सीरिया:

ईरान को अपने हवाई अड्डों का उपयोग करने देगा,

जमीनी समर्थन देगा,

और Golan Heights के रास्ते इज़राइल पर दबाव बना सकता है।

सीरिया इस संघर्ष में ईरान का सक्रिय सैन्य सहयोगी बन सकता है।


🇱🇧 लेबनान (हिज़बुल्ला)

हिज़बुल्ला, जो लेबनान के दक्षिण में स्थित है, ईरान का सबसे प्रमुख प्रॉक्सी समूह है।

इसके पास:

लगभग 1 लाख रॉकेट्स,

युद्ध का अनुभव,

और पूरी तरह ईरान की फंडिंग है।

युद्ध की स्थिति में, हिज़बुल्ला:

इज़राइल के खिलाफ दूसरा मोर्चा खोल सकता है,

और मिसाइल हमले कर सकता है।

अगर यह सक्रिय होता है, तो युद्ध कई फ्रंट पर फैल सकता है।

ईरान ने अमेरिकी बेस पर हमला किया: जुलाई 2025 में, ईरान ने अमेरिका के मिडिल ईस्ट स्थित एक सैन्य अड्डे पर मिसाइल हमला किया। यह हमला सीरिया में स्थित अमेरिकी फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस पर हुआ, जिसमें कई सैनिक घायल हुए। ईरान का कहना है कि यह हमला गाज़ा में चल रहे घटनाक्रम के जवाब में किया गया है।

विस्तृत जानकारी यहां पढ़ें (BBC News)

🇮🇶 इराक की शिया मिलिशिया

इराक की सरकार भले ही तटस्थ बनी रहे, लेकिन वहाँ की शिया मिलिशिया ईरान के प्रति वफादार है।

ये ग्रुप:

अमेरिकी बेस पर हमले कर सकते हैं,

ईंधन और सप्लाई लाइनों को बाधित कर सकते हैं,

और क्षेत्र में अस्थिरता फैला सकते हैं।

ईरान और इराक के बीच करीब 1,600 किमी लंबी सीमा है, और धार्मिक व सांस्कृतिक प्रभाव भी गहरा है।


🇾🇪 यमन (हूती विद्रोही)

यमन के हूती विद्रोही, ईरान द्वारा समर्थित हैं।

ये समूह:

ईरान के ड्रोन और मिसाइलों की मदद से रेड सी (Red Sea) को बाधित कर सकते हैं,

इज़रायली जहाजों पर हमला कर सकते हैं,

और Bab al-Mandeb को संकट बिंदु बना सकते हैं।

ये विद्रोही गोरिल्ला युद्ध में माहिर हैं और रणनीतिक रूप से प्रभावशाली साबित हो सकते हैं।


अन्य संभावित सहयोगी (अभी पुष्टि नहीं हुई)


🇵🇰 पाकिस्तान

पाकिस्तान ने अमेरिका द्वारा ईरान के तीन न्यूक्लियर साइट्स पर हमले की निंदा की है।

लेकिन फिलहाल कोई पुख्ता जानकारी नहीं है कि पाकिस्तान ईरान का सीधा या अप्रत्यक्ष सैन्य समर्थन करेगा।


🇶🇦 क़तर

ईरान द्वारा अमेरिकी एयरबेस पर हमला किए जाने के बावजूद क़तर ने कोई जवाबी कार्रवाई नहीं की है।

क़तर में स्थित Al Udeid एयरबेस में लगभग 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं।

क़तर फिलहाल इस संघर्ष में तटस्थ है, लेकिन वह शांति वार्ता की मध्यस्थता कर सकता है।


🇮🇳 भारत

भारत इस पूरे तनाव को करीबी निगरानी में रखे हुए है।

भारत ने स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है और शांति व संवाद का समर्थन किया है।

चूंकि भारत के ईरान और इज़राइल दोनों से मजबूत संबंध हैं, इसलिए वह अब तक तटस्थ बना हुआ है।


🔚 निष्कर्ष

ईरान इस युद्ध में पूरी तरह अकेला नहीं होगा, लेकिन उसके सहयोगी सीधा सैन्य समर्थन देने से बच सकते हैं।

ईरान की असली ताकत उसका प्रॉक्सी नेटवर्क है — जैसे कि हिज़बुल्ला, शिया मिलिशिया, और हूती विद्रोही। ये समूह:

ड्रोन हमले,

मिसाइल हमले,

और साइबर अटैक के ज़रिए,
अप्रत्यक्ष रूप से ईरान का साथ दे सकते हैं।

इस नेटवर्क की मदद से ईरान बिना अपनी सेना को सीधे युद्ध में उतारे ही असमान युद्ध (asymmetric warfare) छेड़ सकता है।

रूस और चीन गुप्त या खुले तौर पर ईरान को समर्थन दे सकते हैं, खासकर हथियार, ड्रोन तकनीक और कूटनीति के स्तर पर।
अमेरिका, इज़राइल, ब्रिटेन और सऊदी अरब जैसे देश ईरान के खिलाफ सैन्य या रणनीतिक मोर्चा बना सकते हैं।
अगर युद्ध हुआ तो तेल की आपूर्ति पर संकट आएगा, जिससे वैश्विक बाज़ार और आम जनता दोनों प्रभावित होंगे।

अरुण त्रिपाठी

अरुण MyNews98.com के संस्थापक हैं। वे अंतरिक्ष, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर सरल भाषा में गहरी जानकारी प्रस्तुत करते हैं।

Leave a Comment