चाबहार पोर्ट समझौता भारत के लिए एक सुनहरा मौका है जिससे वह मध्य एशिया और अफगानिस्तान में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम कर सकता है और पाकिस्तान में चीन द्वारा बनाए जा रहे ग्वादर पोर्ट का जवाब दे सकता है।
इस पोर्ट के माध्यम से भारत अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप से व्यापारिक संपर्क स्थापित कर सकता है।
विषय-सूची
प्रारंभिक समझौते
सबसे पहले 2015 में भारत और ईरान के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें चाबहार पोर्ट के विकास पर चर्चा हुई।
इसके बाद 2016 में एक द्विपक्षीय समझौता हुआ और अंततः 13 मई 2024 को एक प्रमुख समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
इस समझौते के अनुसार:
भारत चाबहार पोर्ट में लगभग $120 मिलियन का निवेश करेगा।
भारत ईरान को $250 मिलियन की क्रेडिट लाइन भी देगा।
इसके अंतर्गत पोर्ट का विकास और रखरखाव किया जाएगा।
समझौते की मुख्य बातें
भारत की कंपनी India Ports Global Limited (IPGL) और ईरान की Port and Maritime Organisation के बीच 10 साल की लीज डील हुई।
भारत को ईरान के चाबहार पोर्ट के शहीद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन सौंपा गया।
भारत इस पोर्ट की हैंडलिंग क्षमता और अपग्रेडेशन में निवेश करेगा।
दोनों देश मिलकर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक रेल और सड़क के जरिए व्यापार बढ़ाएंगे।
ईरान पर संभावित युद्ध और उसके वैश्विक प्रभाव पर विस्तृत जानकारी के लिए यह रिपोर्ट पढ़ें (BBC News)।
भारत और ईरान के लिए क्यों है यह जरूरी?
भारत के लिए:
भारत-पाकिस्तान संबंध हमेशा से खराब रहे हैं, इस पोर्ट के जरिए भारत पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जुड़ सकेगा।
INSTC (International North-South Transport Corridor) जो कि 7200 किमी लंबा है, उसकी तुलना में यह छोटा और सीधा मार्ग है।
ईरान भविष्य में ऊर्जा (तेल और गैस) का बड़ा स्रोत बन सकता है, जिससे भारत को ऊर्जा आपूर्ति में लाभ मिलेगा।
ईरान के लिए:
ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद, इस समझौते से उसे दक्षिण एशियाई देशों से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
भारत और ईरान के आपसी संबंध मजबूत होंगे और ईरान को इस क्षेत्र में एक रणनीतिक साझेदार मिलेगा।
चाबहार बनाम ग्वादर: रणनीतिक मुकाबला
चाबहार पोर्ट ईरान के सिस्तान बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है, जो हॉर्मुज जलडमरूमध्य के पास है और भारत के कांडला पोर्ट से 768 मील दूर है।
यह ईरान का इकलौता पोर्ट है जिसे सीधे भारतीय महासागर से जोड़ा जा सकता है।
चाबहार, ग्वादर पोर्ट (जो चीन द्वारा समर्थित है) से केवल 170 किमी दूर है।
पढ़ें Times of India का विश्लेषण →
ग्वादर पोर्ट की स्थिति:
यह पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित एक गहरे समुद्री पानी का बंदरगाह है।
यह कराची पोर्ट से 533 किमी और ईरान सीमा से 120 किमी दूर है।
इसे एक चीनी सरकारी कंपनी द्वारा विकसित और प्रबंधित किया जा रहा है।
यह चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का हिस्सा है।
चीन और पाकिस्तान पर प्रभाव
यह समझौता चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के लिए एक चुनौती है क्योंकि भारत एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग पेश कर रहा है।
मध्य एशिया, जो कि लैंडलॉक्ड है, उसे भी भारतीय महासागर से सीधा रास्ता मिलेगा।
भारत पाकिस्तान को बायपास कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जुड़ जाएगा, जिससे पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति कमजोर होगी।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहाँ से विश्व का 20% तेल गुजरता है, वहाँ भारतीय नौसेना की उपस्थिति चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए चिंता का कारण बनेगी।
1️⃣ चाबहार vs ग्वादर: चाबहार पोर्ट, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से सिर्फ 170 किलोमीटर दूर है — यह भारत के लिए CPEC का सीधा जवाब है।
2️⃣ सऊदी अरब की नजर: हाल ही में सऊदी अरब ने भी चाबहार पोर्ट से व्यापार संभावनाओं की रुचि दिखाई है, जिससे यह और ज्यादा बहुपक्षीय बन गया है।
3️⃣ जापान की भागीदारी: जापान ने भी लॉजिस्टिक सुधार और कंटेनर सुविधाओं में निवेश करने की बात कही है, जो इस पोर्ट को एशिया-पैसिफिक नेटवर्क से जोड़ सकता है।
4️⃣ अफगानिस्तान के लिए जीवनरेखा: तालिबान शासन के बाद भी भारत चाबहार के ज़रिए अफगान नागरिकों को दवाइयां और गेंहू पहुँचा रहा है — यह soft-power diplomacy का हिस्सा है।
5️⃣ Dual-Use Facility: चाबहार को न केवल व्यापार के लिए, बल्कि भविष्य में **स्ट्रैटजिक नेवल सपोर्ट बेस** के रूप में भी विकसित किया जा सकता है — जो भारत की इंडो-पैसिफिक नीति से जुड़ता है।
अमेरिका और वैश्विक प्रतिक्रिया
ईरान पर प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका इस परियोजना का समर्थन करता है, क्योंकि यह अफगानिस्तान के आर्थिक विकास में मददगार हो सकता है।
यह मध्य एशिया और खाड़ी देशों को चीन से स्वतंत्र विकल्प प्रदान करता है।
रूस भी चाबहार को INSTC से जोड़ने में रुचि दिखा चुका है, जिससे भारत-ईरान-रूस की रणनीतिक त्रिमूर्ति बन सकती है।
पढ़ें Reuters रिपोर्ट →
निष्कर्ष
चाबहार पोर्ट केवल एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत के लिए पश्चिम एशिया में एक भूराजनीतिक एंकर बन सकता है।
यह परियोजना दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब है।
2016 में जब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, तो उन्होंने कहा था कि चाबहार पोर्ट और कांडला पोर्ट के बीच की दूरी, दिल्ली और मुंबई से भी कम है।
भारत-ईरान चाबहार पोर्ट समझौता एक मात्र व्यावसायिक लेन-देन नहीं, बल्कि चीन के क्षेत्रीय वर्चस्व को संतुलित करने की एक रणनीतिक चाल है।
